मंगलवार, 15 मई 2012

ये ब्लॉगकू उद्देस्य

गढ़वळि भासा भारतका उत्तराखण्ड प्रान्तका गढ़वाळ छेत्राऽ पौड़ि गढ़वाळ, टीरि गढ़वाळ, देरादूण, हरद्वार, उत्तरकासी, चमोळि अर रुद्रपरयाग जनपदुमा बोल्ये जाणवळि  एक प्राचीन भासा च । भासाबिग्यान्यों अर इतिहासकारौं अनुसार गढ़वळि भासा आठवीं सताब्दिमा पैदा ह्वेगि छै। 

आज हमारि या प्राचीन अर समिर्ध भासा हरचणि  च किलैकि हम अपड़ि भासाकू जादा प्रयोग नि करणा छाँ । हमारि नै छिवांळ (पीढ़ी) ईं भासाथैं छ्वड्न लगीं च । जु आज हम अपड़ि भासा बचौणौऽ परयास नि करला त भोळ ईंन लुप्त ह्वे जाण। ये ब्लॉगकू उद्देस्य च गढ़वळि भासा अर साहित्याकू परचार-परसार 
करण अर येसे संबंधित जानकारी यख सुलभ करौण। जै भारत, जै उत्तराखण्ड, जै गढ़देस!!!  

1 टिप्पणी:

  1. हरीश ममगाई29 मई 2016 को 11:09 pm बजे

    साकेत, आपक ब्लॉग देखिक भोत दिल खुश ह्वे। मै कुकरेतीजीक पत्रिका उत्तराखंडी ई पत्रिका नियम सी पढ़दों। इ पत्रिका भोत उत्तम च। आप अपरी भासाक प्रति जागरूक छै, जाणीक भोत अच्छू लगी। आप जन युवागण सी यी अपेक्षा च। मै आपक ब्लॉग तैं फलणो फूलणोक कामना करदों।

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