बुधवार, 16 मई 2012
मंगलवार, 15 मई 2012
उत्तराखण्ड राजैऽ मुख्य भासा
उत्तराखण्ड राजमा द्वि मुख्य भासा छन - गढ़वळि अर कुमाँउनी। कुमाँउनी भासातैं गढ़वळिमा कुमौनी बि ब्वल्ये जांदु। ये द्विय्या भासा एक हैंकाकि बैणी छन। द्विय्योंकू मूल एक्कि च, माने यूंकि ब्वे वैदिक संस्कृत भासा च जैन कालांतरमा खस प्राकृत (पहाड़ी प्राकृत) तैं जनम दिनि अर येइ पहाड़ी प्राकृतबिटि गढ़वळि अर कुमौनी भासा निक्लिन। गढ़वळि भासा गढ़वाळ मण्डलमा अर कुमौनी भासा कुमौं मण्डलमा ब्वल्ये जांदन. इन नी च कि उत्तराखण्डमा येइ द्वि भासा छन। उत्तराखण्डमा त कई हौर भासा बि छन जूं मद्दे जौनसारी, रौंग्पा, थारुवाटी, बुक्सा, जाडी, जौहारी, ब्यांगसी, चौदांगसी आदि मुख्य छन। यूंमन कई भासा त विलुप्ति कि कगार फर छन। रौंग्पा, जाडी, जौहारी, ब्यांगसी, चौदांगसी आदि भोटिया भासा छन अर सीमान्त छेत्रुमा ब्वल्ये जांदन। जौनसारीतैं कई भासा-बिज्ञानी गढ़वळिकि एक बोलि मण्दन पण जौनसारीमा कथ्गै सब्द अलग छन अर बाक्य-बिन्यासमा बि फरक छैंच। गढ़वळि उत्तराखण्डैऽ सबसे ठुल्ली भासा च अर सबसे जादा छेत्रमा ब्वल्ये जांदि। गढ़वळिमा भासाकू साहित्य भौत समिर्ध च अर गढ़वळिमा कई किताबि बि छपेंदि छन।
बोलणवळा अर सामान्य साहित्य
एथ्नोलोगका अनुसार
सन 2000 मा गढ़वळि बोलणवळा लोखू
संख्या 2920000 छै। गढ़वळि भासा
देवनागरी लिपिमा लिख्ये जाँदि। गढ़वळिमा कई किताबि छपीं छन। पौड़ीबटि गढ़वळिमा यक
समाचार-पत्र छपेंदु जैकु नौं "उत्तराखंड खबरसार" च। यक हौर पत्र
ड्येरादूणबटि छपेंदु जैकु
नौं "रंत-रैबार" च। कई पत्र-पत्रिकौंमा [जन "युगवाणी",
"जनपक्ष आजकल",
"उत्तराखंड वाणी", उत्तराँचल पत्रिका"] गढ़वळि कविता,
गीत, कथा आदि छपेंदा छन।
ये ब्लॉगकू उद्देस्य
गढ़वळि भासा भारतका उत्तराखण्ड
प्रान्तका गढ़वाळ छेत्राऽ पौड़ि गढ़वाळ, टीरि गढ़वाळ, देरादूण, हरद्वार, उत्तरकासी, चमोळि अर रुद्रपरयाग जनपदुमा बोल्ये
जाणवळि एक प्राचीन भासा च । भासाबिग्यान्यों अर इतिहासकारौं अनुसार गढ़वळि भासा आठवीं सताब्दिमा पैदा ह्वेगि छै।
आज हमारि या प्राचीन अर समिर्ध भासा हरचणि च किलैकि हम अपड़ि भासाकू जादा प्रयोग नि करणा छाँ । हमारि नै छिवांळ (पीढ़ी) ईं भासाथैं छ्वड्न लगीं च । जु आज हम अपड़ि भासा बचौणौऽ परयास नि करला त भोळ ईंन लुप्त ह्वे जाण। ये ब्लॉगकू उद्देस्य च गढ़वळि भासा अर साहित्याकू परचार-परसार
करण अर येसे संबंधित जानकारी यख सुलभ करौण। जै भारत, जै उत्तराखण्ड, जै गढ़देस!!!
आज हमारि या प्राचीन अर समिर्ध भासा हरचणि च किलैकि हम अपड़ि भासाकू जादा प्रयोग नि करणा छाँ । हमारि नै छिवांळ (पीढ़ी) ईं भासाथैं छ्वड्न लगीं च । जु आज हम अपड़ि भासा बचौणौऽ परयास नि करला त भोळ ईंन लुप्त ह्वे जाण। ये ब्लॉगकू उद्देस्य च गढ़वळि भासा अर साहित्याकू परचार-परसार
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